History of modern Hindi

Modern Period: Nomenclature and Division

इतिहास अतीतोन्मुख नहीं भविष्योन्मुख होता है, बह जड़ नहीं गत्यालक होता है। अतीतोन्मुख इतिहासकार अथवा साहित्यकार पुनरुत्थानवादी होकर जड़ हो जाता है। अतीतोन्मुखता हमें कहीं ले नहीं जाती बल्कि एक तरह की भावनामयता में बाँध कर सही कर्ततव्य से विमुख बना देती है।

अतीतोन्मुखता हमें पुनरुत्थानवादी बनाती है तो भविष्योन्मुखता सर्जनालंक | इस अर्थ में इतिहास लिखने का मतलव होता है भविष्योन्मुखी होना। यह होकर ही वह रचनामक हो सकता है। इतिहास का विकास-क्रम प्रकृति की तरह कार्य-कारण की श्रृंखला से वैधा नहीं रहता।

इतिहास मनुष्य का ही होता है। वस्तुतः वह एक मानवीय: तत्त्व है। ऐतिहासिक घटनाएँ परिवेश के अलावा मनुष्य की आकांक्षाओं, निर्णय, क्रिया-कलाप आदि पर भी बहुत कुछ निर्भर करती हैं। दूसरे शब्दों में इतिहास मात्र भीतिकता से निर्मित नहीं होता बल्कि उसमें मानवीय स्वतंत्रता और निर्णय का योग भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

राष्ट्र और जाति को अनेक ऐसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है जी मनुष्य के नियंत्रण में नहीं होतीं। इन घटनाओं से भी देश और जाति का नक्शा वदल जाता है।

यह मान कर चलना होगा कि इतिहास का कोई दर्शन इतना मुकम्मल नहीं जिसके आधार पर इतिहास को उसकी पूरी समग्रता में समेटा जा सके । जितना यह इतिहास के साथ सच है उतना ही साहित्य के साथ भी।

पर इतिहास के लेखक की तरह साहित्य के इतिहास का लेखक तथ्यों के अथरपिन में उतना स्वतंत्र नहीं है। इतिहास लेखक की तरह उसके पास तरह-तरह के आँकड़े नहीं होते–आधे-अधूरे, सही और गलत आँकड़े। उसके सामने ग्रंथ होते हैं।

प्राचीन काल के ग्रंथों के संबंध में तो प्रामाणिक और अप्रामाणिक कहा जा सकता है। पर आधुनिक काल के ग्रंथों के सम्बन्ध में तो यह भी नहीं कहा जा सकता। अतः साहित्य के इतिहासकार को दुहरे दीर से गुजरना पड़ता है अर्थात्‌. उसे ऐसा इतिहास लिखना पड़ता है जो साहित्यिक भी हो और ऐतिहासिक-सामाजिक भी इतिहास के चीखटे में साहित्य को फिट कर देना साहित्य का इतिहास नहीं है।

इतिहास के पुष्टयर्थ इतिहासकार साहित्य को इतिहास के चौखटे में फिट करने लगे हैं। बहुत से वादग्रस्त साहित्येतिहास लेखक साहित्य को एक खास तरह के ऐतिहासिक सूत्रों में संग्रथित कर देते हैं । पर वह साहित्य का इतिहास न होकर समाजशाञ्लीय इतिहास हो जाता है।

इस तरह साहित्य के अपने व्यक्तित्व का पक्ष– जो व्यक्तित्व चनकर समाज के निर्माण में योग देता ह–उपेक्षित रह जाता है |


साहित्य के ग्रंथ वे ही रहते हैं पर काल बदलता जाता है। जिसमें काल के यदलाव में भी कुछ शेष वचा ग्हता है या हर काल के नये अर्थापन के लिए कुछ छूटा रहता है वह साहित्य श्राण होता है। केवल अखवबारी साहित्य पर साहित्य का इतिहास निर्मित नहीं होता।

वह इतिहास-लेखन का उपकरण वन सकता है पर साहित्य का इतिहास लेखक उस पर केवल चलता ध्यान देगा। वह तो उन ग्रंथों को (ऑँकड़ों को) दखता है जो इतिहास को गति देने में, मोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

आधुनिक युग इतनी तेजी से वदलता रहा है और वदल रहा है कि साहित्य के बदलाव से भी उसे समझा जा सकता है । इस बदलाव को– क्षिप्रतर बदलाव को–साहित्य “और इतिहास दोनों के सन्दर्भों में एक साथ पकड़ना ही इतिहास है |

यह पकड़ तब तक दिश्वसनीय नहीं हो सकती जव तक समसामयिक अखवारी साहित्य को श्रेष्ठ भविष्योन्मुखी साहेत्य से अलगाया न जाय। प्रत्येक युग का आधुनिक काल ऐसे साहित्य से भरा रहता जो सहित्येतिहास के दायरे में नहीं आता ।

किन्तु यह जरूरी नहीं है कि हम अपने इतिहास के लिए ग्रंथों का जो अनुक्रम प्रस्तुत करेंगे वह कल भी ठीक होगा, अपरिवर्तनीय होगा। इतिहास लिखने का क्रम तव तक जारी रहेगा जब तक मानवीय सृष्टि रहेगी | आरंभ में श्री कृष्णशंकर शुक्ल ने “आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिखा था जो अब बहुत पुराना पड़ गया है ।

यह इतिहास मूलतः साहित्यिक कृतियों पर आधारित है पर उनका अपेक्षित पर्यावरण सर्वत्र दृष्टि में रखा गया है । शुरू से ही भविष्योन्मुखता को लक्ष्य में रखने के कारण श्रेष्ठ साहित्यकार अपने आप रेखांकित हो उठे हैं।

आधुनिक काल : नामकरण तथा कालविभाजन

साहित्य के इतिहास में काल का सीमांकन सबसे अधिक जटिल समस्या है। किसी काल खंड की शुरुआत किस समय से होती है इसे वैज्ञानिक सत्य के रूप में नहीं वताया जा सकता। एक काल खंड दूसरे काल खंड से अपने वदलाव के कारण अलंग होता हैं।

बदलाव की प्रक्रिया तो अरसे से चलती रहती है पर नए काल खंड का निधारिण तब होता है जब वदलाब के चित्र हमारी आर्थिक-सांस्कृतिक स्थितियों और कलारूपों तथा भाषा में स्पष्टत: दिल्लाई देने लगते हैं इसलिए साहित्येतिहास के लेखन में जो काल निर्धारण किया जायगा वह लचीला होगा ।

इस बदलाव को जब डॉ० रामकुमार वर्मा रोमंटिक लहजे और ग्रियर्सनी शैली में अप्रत्याशित और कुतूहलपूर्ण कहते हैं (हिन्दी साहित्य, तृतीय खंड, भारतीय हिन्दी परिषद्‌, प्रयाग) तो विकसित इतिहास-दृष्टि के पाठकों का मनोरंजन होता है।

वस्तुतः हिन्दी-साहित्य के इतिहास में जिसे हम आधुनिक काल कहते हैं उसके विकास का क्रम एक शताब्दी पहले से ही प्रारम्भ हो ज्ञाता है। बदलाव के स्पष्ट चिह्न उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में दिखाई पड़ने लगते हैं।

संयोग है कि हिन्दी साहित्य में आधुनिक जीवन-वोध के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चन्द्र का जन्म सन्‌ १८९०–टठोक उन्नीसवी शत्ती के मध्य–में होता है। अतः इतिहास लेखकों ने इस वर्ष को ही आधुनिक हिन्दी साहित्य की शुरुआत का वर्ष मान लिया।

किंतु यह वर्ष स्वयं इतिहास की गतिमानता या बदलाव में किसी तरह की भूमिका नहीं अदा करता| इतिहास के काल-विभाजन की रेख़ा कम से कम दो विभिन्न प्रवृत्तियों को स्पट्त: अलगाने वाली तथा इस अलगाव के लिए खुद भी वहुत कुछ उत्तरदायी होनी चाहिए।यदि सन्‌ १८५७ को आधुनिक काल का प्रारंभिक विन्दु मान लिया जाय तो उपर्युक्त दोनों शर्तें पूरी हो जाती हैं।

सन्‌ १८५४७ का प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम (जो पहले गदर के नाम से प्रसिद्ध था) ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ें हिला देने वाला सिद्ध हुआ। इसके पहले देश के अन्य भागों में छिटपुट विद्रोह हो चुके थे।

उदाहरणार्थ, वंगाल का संन्यासी विद्रोह (१७६३-१८००), उड़ीसा के जमींदारों का विद्रोह, (१८०४-१६१७), विजय नगरम्‌ के राजा का विद्रोह (१७६४) आदि। सन्‌ १८९७ का विद्रोह भी हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्र के एक सीमित भाग तक ही फैल कर रह गया था, यद्यपि यह क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक व्यापक था।

किन्तु अपनी प्रकृति, और मरचना मेंयह भिन्न था।इसकी शुरुआत अवध के सिपाहियों ने आकस्मिक ढंग से की, किन्तु इसकी स्थितियाँ वर्षों पहले से वन रही थीं। बाद में इसमें जमींदार, किसान, कारीगर और सामंत भी जुट गए।

छोटी सी शुरुआत जनता की व्यापक लड़ाई में बदल गई। इसे दवाने में अंग्रेजों के छक्के झूट गए। इसी के फलस्वरूप कम्पनी राज्य का अंत हुआ. और महारानी विक्टोरिया को घोषणा-पत्र जारी करना पड़ा।

देश के मिजाज को बदलने तथा राष्ट्रीयता की ओर उन्मुख करने में इसका विशेष महत्त्व हैं। अतः इसी को आधुनिक काल का प्रारंभिक वर्ष मानना सर्वांधिक तर्कसंगत है।

नामकरण

आधुनिक शब्द दो अ्थों की यूचना देता है–मध्यकाल से भिन्नता की और नवीन इहलौकिक दृष्टिकोण की। मध्यकाल अपने अवरोध, जड़ता और रूढ़िवादिता के कारण स्थिर और एकरस हो चुका धा। एक विशिष्ट ऐतिहासिक प्रक्रिया ने उसे तोड़कर गत्यामक बनाया |

मध्यकालीन जड़ता और आधुनिक गत्याम्॒कता को साहित्य और कला के माध्यम से समझा जा सकता है। रीति-काल की कला और साहित्य अपने-अपने कथ्य, अलंकृति और शैली में एक रूप हो गये थे । वे घोर श्रृंगारिकता के वँधे घाटों में वह रहे थे। इन छंदों में न वैविध्य था और न विन्यास (डिक्शन) में । एक ही प्रकार के छंद एक ही प्रकार के ढंग।

आधुनिक काल में वैधे हुए घाट टूट गए और जीवन की धारा विविध स्रोतों में फूट निकली । साहित्य मनुष्य के बृहत्तर सुख-दुःख के साथ पहली वार जुड़ा। आधुनिक शब्द से जो दूसरा अर्थ ध्वनित होता है वह है इहलौकिक दृष्टिकोण ।

धर्म, दर्शन, साहित्य, चित्र आदि सभी के प्रति नए दृष्टिकोण का आविर्भाव हुआ। मध्यकाल में पारलीकिक दृष्टि से मनुष्य इंतना अधिक आच्छन्न था कि उसे अपने परिवेश की सुध ही नहीं थी। पर आधुनिक युग में मनुष्य अपने पर्यावरण के प्रति अधिक सतर्क हो गया।

आधुनिक युग की पीठिका के रूप में इस देश में जिन दार्शनिक चिंतकों और धार्मिक व्याख्याताओं का आविर्भाव हुआ उनकी मूल विंता धारा इहलौकिक ही है। सुधार-परिष्कार, अतीत का पुनराख्यान नवीन दृष्टिकोण का फल है।

आधुनिक युग की ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है कि साहित्य की भाषा ही बदल गई–ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली ने ले ली।उपविभाग रामवन्द्र शुक्ल ने आधुनिक काल का जो उप-विभाजन किया है वह एकसूत्रता के अभाव में विसंगतिपूर्ण हो गया है ।

उन्होंने आधुनिक काल को दो खण्डों में बॉँटा है– गद्य खंड और काव्य खंड। ये दोनों खंड एक दूसरे से इतने पृथक्‌ हैं कि उनमें एकतानता नहीं आ पाती, दोनों खंडों को दो-दो प्रकरणों में वॉँटा गया है। गद्य के पहले प्रकरण में ब्रजभाषा गद्य और खड़ी वोली गद्य का विकास विवेचित है।

दूसरे प्रकरण में गद्य साहित्य का आविर्भाव बविश्लेषित है। इसे फिर तीन उत्थानों में विभाजित किया गया–प्रथम, द्वितीय और तृतीय । काव्य खंड में भी दो प्रकरण हैं–पुरानी काव्य धारा और नई काव्य धारा। नई धारा के भी तीन उत्धान हैं–अधम, द्वितीय और तृतीय |

शुक्ल जी के गद्य खंड और काव्य खंड एक दूसरे से मर्वथा अलग हैं, एक की प्रवृत्ति का दूसरे की प्रवृत्ति से कोई तालमेल नहीं है। ऐसा लगता है मानो गद्य खंड में एक प्रवृत्ति क्रियाशील है तो काव्य खंड में दूसरी प्रवृत्ति। उदाहरणार्थ, काव्य खंड दूसरे प्रकरण के तृतीय उत्थान (काव्य में जो छायावाद के नाम से अभिहित किया जाता है) तथा गद्य खंड के द्वितीय प्रकरण के तृतीय उत्थान में कोई एकरूपता नहीं निरूषित की जा सकी है।

इस खंड दृष्टि के कारण इतिहास का नरन्‍्तर्य ओझल हो गया है।परवर्ती इतिहासकारों ने प्रायः शुक्लजी का अनुगमन किया। आधुनिक काल के इतिहास लेखन में सामान्य रूप से उनकी उत्थानवादी शैली ही स्वीकृति कर ली गई।

कुछ लोगों ने आधुनिक काल के विकास के प्रथम दो चरणों को भारतेंदु युग और द्विवेदी युग कहना अधिक संगत समझा। किन्तु इन नामों की ग्राह्मता को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। भारतेंदु युग और द्विवेदी युग की परिकल्पना कर लेने पर युगों की बाढ़ आ गई।

भारतीय हिन्दी परिषद्‌ प्रयाग से प्रकाशित हिन्दी साहित्य (तृतीय खंड) में उपन्यासों के सन्दर्भ में प्रेमचन्द युग और नाटकों के संदर्भ में प्रसाद युग की कल्पना की गई । पता नहीं, समीक्षा के संदर्भ में शुक्ल युग क्‍यों नहीं लिखा गया? जितने युग उतने संदर्भ ! एक इतिहास और |

डॉ० नगेन्द्र के संपादन में “हिन्दी साहित्य का इतिहास’ प्रकाशित हुआ है। अनेक लेखकों द्वारा लिखे जाने के कारण इसमें परस्पर विरोधी दृष्टिकोण मिलेंगे। पूर्वपीठिकाओं की स्थापनाओं के साथ विधाओं की संगति नहीं बैठ पाती। उदाहरणार्थ भारतेंदु युग को लिया जा सकता है।

इसका दूसरा नाम है पुनजगिरण। पर भारतेंदु के नाटकों की पारंपरिक खतीनी से पुनजागरण का दूर का भी रिश्ता नहीं है।छायाबाद-युग सामान्यतः सर्वमान्य है। इसे विभाजक रेखा मानकर कालों का नामकरण अधिक सुविधाजनक, तर्कसंगत और औचित्यपूर्ण होगा।

यों ‘छायावाद’ शब्द अपने अर्थ-संकोच और एकांगिकता के कारण ग्राह्म नहीं है। इसका सीधा सम्बन्ध पुनर्जागरण काल से है। पर यह शब्द व्यापक परिप्रेक्ष्य में मीर्जू नहीं है। रोमैटिक’ शब्द का समानार्थी शब्द ही इस युग को समग्रता में उजागर कर सकता है।

हिन्दी में स्थच्छन्दतावाद’ शब्द का प्रयोग ‘रोमैंटिसिज्म’ के अर्थ में किया जाने लगा हैं। अतः जिसे छायावाद युग कहा जाता है उसे स्वच्छन्दताबाद युग के नाम से अभिहित किया जाना चाहिए।

यह शब्द अपनी अर्थवत्ता में गांधी-नेहरू युग के आदर्शों और अन्तर्विरोधों की समानान्तरता पा लेता है। रोमैंटिक या स्वच्छन्दतावादी आन्दोलन में जिस वैयक्तिकता को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है वह गांधीवादी आन्दोलन में आद्यन्त माजूद है।

‘अन्तरामा की आवाज’ इस युग के संपूर्ण साहित्य में विद्यमान है। स्वच्छन्दतावादी साहित्य मुक्ति का साहित्य है, ठीक उसी तरह जैसे गांधी-नेहरू का आन्दोलन समग्र अर्थ में मुक्ति का आन्दोलन था।

्वछन्दतावाद युग’ नाम स्वीकार कर लेने पर न तो इसे ईसाइयत के फैंटसमाटा से जोड़ने की जरूरत पड़ेगी और न स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कह कर सरलीकरण की आवश्यकता | “छायावाद’ को लेकर जितनी परिभापाएँ दी गई हैं उनकी दृष्टि में केवल काव्य रहा है।

प्रसाद, जैनेन्द्र और इलाचन्द्र जोशी आदि के उपन्यासों को, जो उसी काल में लिखे गए, क्या छायावादी कहा जायगा? इस काल के काव्य, उपन्यास, कहानी, निवन्ध, आलोचना आदि को स्वच्छन्दतावादीतो कहा जा सकता है, छायावादी नहीं।

स्वच्छन्दतावादी युग के ठीक पहले का काल पूर्व-स्वच्छन्दतावादी युग के नाम से अभिहित किया जाना चाहिए। द्विवेदी युग व्यक्ति-वाचक नाम होने से यो ही अग्राद्म है, दूसरे इससे किसी तरह की प्रवृत्ति का वोध नहीं होता |

तीसरे इस नाम के कारण ऐतिहासिक प्रवाह खंडित हो जाता है। इस युग में निवन्ध और कविताएँ अधिक लिखी गईं। निवन्ध लेखकों में मुख्यतः महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधव प्रसाद मिश्र, गोविन्द नारायण मिश्र, वालमुकुन्द गुप्त, बन्द्रधर शर्मा गुलेरी, पूर्णसिह की गणना की जाती है।

श्रीधर पाठक, रामचरित उपाध्याय, मनेही, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, रूपनागायण पांडेय, मुकुटधर पांडेय आदि इस युग के प्रमुख कवि हैं। निवन्ध-लेखकों में पहले तीन द्विवेदी-कलम के लेखक हैं। शेष तीन पूर्व-स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के निवन्धकार हैं क्योंकि उनमें स्वच्छन्दता की प्रवृत्ति पायी जाती है। निवन्ध-लेखकों के रूप में इन्हीं तीनों का महत्त्व है।

द्विवेदी-कलम के कवियों में केवल मेथिलीशरण गुप्त को ही ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त है, वह भी ‘साकेत’ के कारण। “साकेत’ पर स्वच्छन्दतावाद का कम प्रभाव नहीं है। श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, मुकुटधर पांडेय को शुक्लजी ने स्वयं प्रकृत स्वच्छन्दतावादी कहा है।

बस्तुतः अगले संदर्भ में इन्हीं कवियों का विकास प्रसाद, निराला, पंत में हुआ। अतः इस युग को पूर्व-स्वच्छन्दता युग का नाम देना अधिक संगत है।

भारतेंदु युग को पुनर्जागरण युग कहने में कोई आपत्ति नहीं उठाई जानी चाहिए।स्वच्छन्दता युग के थाद के काल को उत्तर-स्वच्छन्दताबाद युग कहा जा सकता है। इसे पुनः तीन दशकों में वॉटना अधिक संगत प्रतीत होता है। संक्षेप में इस काल के उप-विभाजन का प्रारूप निम्नलिखित ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है–

१-पुनजगिरण काल–१ ८४७-१६०० ई०

२-पूर्व स्वच्छन्द्तावाद काल—9 ६००-१ ६२० ई०

३-स्वच्छन्दतावाद-काल—१ ६२०-१ ६४० ई०

४-उत्तर स्वच्छन्दतावाद-काल—१ ६४० ई०

(क) पहला दशक (प्रगति. और स्वतन्त्रता का दडूंद्व) .

(ख) दूसरा दशक (संतुलन की खोज और आधुनिकता)

(ग) तीसरा दशक (आधुनिकता वोध की रचनाएँ)