इस फ़िल्म के किरदार से खुद को कितना करीब पाते हैं ?

इस फ़िल्म के किरदार से खुद को कितना करीब पाते हैं ?

ट्रेलर देख कर किसी ने कहा था कि आप जैसे कई एक्टर इस फ़िल्म को देख कर रोएंगे। ये किरदार मेरे बहुत करीब है। ये उस एक्टर की कहानी है, जिसे देख कर लोग कहते हैं कि, ”अरे सर आपकी फ़िल्म देखी है, क्या गज़ब का काम करते हैं, आपका नाम क्या है?” तो ये अपनी पहचान बनाने वाली कहानी है। हर कोई अपने क्षेत्र में पहचान बनाना चाहता है। और ये पहचान दुनिया के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए बनाना चाहता है। ‘कामयाब’ मतलब ये नहीं कि लाखों लोग आपके साथ फोटो खिंचा रहे हैं और ऑटोग्राफ़ ले रहे हैं। कामयाब मतलब संतुष्टि। आपकी अपनी संतुष्टि।

एक इंटरव्यू में आपने कहा कि 'हमें अवार्ड नहीं चाहिए, हमें दर्शक चाहिए'.. आपको लगता है कि अवार्ड पाने वाली फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुँचती ?

एक इंटरव्यू में आपने कहा कि ‘हमें अवार्ड नहीं चाहिए, हमें दर्शक चाहिए’.. आपको लगता है कि अवार्ड पाने वाली फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुँचती ?

ये मैंने नेशनल अवार्ड के लिए बोला था। नेशनल अवार्ड सरकार की तरफ से होता है, वो कोई फ़िल्मफ़ेयर, ज़ी, स्क्रीन अवार्ड नहीं है। लिहाज़ा, ये सरकार का धर्म बनता है कि देश में जितनी अच्छी फिल्में बन रही हैं, उसे दर्शकों तक तो पहुचाएं। मेरी एक फ़िल्म थी Turtle, जो कि पानी की कमी पर बनी थी। उसे नेशनल अवार्ड दिया गया। लेकिन कितने ही लोगों ने देखा? सोचिये यदि Turtle जैसी फ़िल्म को स्कूल में बच्चों को दिखाया जाए कि पानी की कमी पर एक ऐसी फ़िल्म बनी है .. तो क्या प्रभाव पड़ेगा। लोग जागरूक होंगे। तो मेरा ये मानना है कि सिर्फ अवार्ड मत पकड़ाओ, इसके बदले साल में एक दिन कुछ जगहों पर राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामांकित सभी फिल्मों को दर्शकों को दिखाओ। ऐसे चुपके चुपके अवार्ड देने का क्या मतलब है।

आंखों देखी, कड़वी हवा जैसी आपकी भी कुछ फिल्में हैं, जो दर्शकों के बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पायी। इसका अफसोस है ?

आंखों देखी, कड़वी हवा जैसी आपकी भी कुछ फिल्में हैं, जो दर्शकों के बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पायी। इसका अफसोस है ?

आखों देखी को तो किसी लायक ही नहीं समझा गया था। कड़वी हवा को special mention दिया गया। लेकिन ये सभी फिल्में दिखनी चाहिए, ये ज़रूरी फिल्में हैं। आज मैं शाहरुख खान की तारीफ क्यों करता हूँ.. क्योंकि उन्होंने एक कदम लिया है कि वो अच्छे विषय पर बनी छोटी independent फ़िल्मों को भी प्रस्तुत करेंगे। उनकी फिल्में 100, 200 करोड़ कमाती है, उन्हें क्या ज़रूरत पड़ी। लेकिन जो काम सरकार को करना चाहिए, वो शाहरुख खान कर रहे हैं।

एक फ़िल्म से शाहरुख खान या रेड चिलीज़ के नाम जुड़ जाने से फर्क दिखता है?

एक फ़िल्म से शाहरुख खान या रेड चिलीज़ के नाम जुड़ जाने से फर्क दिखता है?

बहुत फ़र्क पड़ता है। लोगों तक पहुँचने का संघर्ष लंबा चलता फिर। शाहरुख का नाम जुड़ने से वो संघर्ष कम हो गया। कड़वी हवा डेढ़- दो साल पहले आ चुकी है, उसको अब तक उतने लोगों ने नहीं देखा होगा, जितने लोगों ने ‘कामयाब’ के ट्रेलर को देख लिया है।

कई बार बात कही जाती है कि इंडस्ट्री भी एक्टर और कैरेक्टर एक्टर में भेदभाव करती है। आपका अनुभव क्या कहता है?

भेद भाव क्यों नहीं होगा? मुझसे कोई फ़िल्म नहीं बिकेगी। लोग ये नहीं कहेंगे कि फ़िल्म में संजय मिश्रा हैं और साथ ही अजय देवगन भी हैं। नहीं, मैं उन्हें सपोर्ट कर रहा हूँ। वो फ़िल्म (की कमाई) को ऊपर ले जाते हैं। तो फर्क होना लाज़िमी है। मैं मानता हूं कि लोग मेरे काम को पसंद करते हैं। लेकिन एक एक्टर से फ़िल्म बिकती है, एक एक्टर सपोर्ट देता है।

बतौर अभिनेता अपनी फिल्में, अपने करियर से संतुष्ट हैं ?

बतौर अभिनेता अपनी फिल्में, अपने करियर से संतुष्ट हैं ?

सच कहूं तो ये शहर कब आपको ‘ऐ भाई’ और कब आपको ‘सर’ बनाता है, ये आपको भी एहसास नहीं हो पाता है। तो फिलहाल संतुष्टि यही है कि लोग सर बोलने लगे गए हैं। बाकी मैंने पैसों के लिए कभी फ़िल्म नहीं की है। बहुत सारी फिल्मों में मैंने फ्री काम भी किया है। जैसे शार्ट फिल्में जो मैं करता हूँ, उसके लिए पैसे नहीं लेता हूँ। लेकिन उन फ़िल्मों में जो किरदार मुझे मिलते हैं, वो फ़ीचर फ़िल्म में कभी नहीं मिलते। वहां किरदार निभाने की संतुष्टि मिलती है।

किसी फ़िल्म को हामी भरने से पहले आप किन बातों का ध्यान रखते हैं ?

किसी फ़िल्म को हामी भरने से पहले आप किन बातों का ध्यान रखते हैं ?

सबसे पहले निर्देशक देखता हूँ। मैं कभी स्क्रिप्ट नहीं पढ़ता हूँ। मैंने ‘कामयाब’ की भी स्क्रिप्ट नहीं पढ़ी है। मुझे लगता है कि कोई इंसान साल, दो साल में एक स्क्रिप्ट लिख कर लाता है, तो दो घंटे में पढ़ कर उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव करना सही नहीं है। आप निर्देशक हैं, आप मुझे स्क्रिप्ट सुनाइये। जब आप मुझे स्क्रिप्ट सुना रहे हैं और यदि मुझे अपने दिमाग में फ़िल्म दिखने लग गई तो मैं समझ जाता हूँ कि फ़िल्म में मुझे क्या करना है।

अब बॉलीवुड फिल्मों में चरित्र अभिनेताओं के लिए बेहतरीन किरदार लिखे जा रहे हैं और कई कलाकार सामने आ हैं। इस सकारात्मक बदलाव से खुश हैं?

अब बॉलीवुड फिल्मों में चरित्र अभिनेताओं के लिए बेहतरीन किरदार लिखे जा रहे हैं और कई कलाकार सामने आ हैं। इस सकारात्मक बदलाव से खुश हैं?

बदलाव सिनेमा में भी आ रहा है, दर्शकों की पसंद में भी आ रहा है। ऑडियंस को अब अलग अलग तरह के कंटेंट चाहिए। सिर्फ हीरो – हीरोइन की प्रेम कहानी देखना अब बहुत हो गया। इसीलिए अब पंकज त्रिपाठी, नीना गुप्ता, संजय मिश्रा, सीमा पाहवा जैसे लोग भी सामने आ रहे हैं क्योंकि लोग इनके किरदारों से जुड़ा महसूस करते हैं। इनके किरदारों में किसी को अपना चाचा दिखता है, किसी को माँ, किसी को पड़ोसी, किसी को पिता, किसी को बहन।

इतने सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में चरित्र अभिनेताओं को वो पहचान मिली है, जिनके वो हकदार रहे हैं? आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

इतने सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में चरित्र अभिनेताओं को वो पहचान मिली है, जिनके वो हकदार रहे हैं? आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

प्राण साहब ने इतने अलग अलग तरह के किरदार किये हैं कि उस वक़्त के हीरो भी शायद डर जाते होंगे कि हमने क्यों नहीं किया। महमूद को ही ले लीजिए, उनके लिए तो सेट पर हीरो तक इंतेज़ार करते थे। इस लिस्ट में कई अभिनेता हैं। बीच में उतार चढ़ाव आया। लेकिन हां पहचान तो मिली है। कुछ बदलाव आया है, कुछ आएगा। मैं सकारात्मक सोचता हूँ।

आपकी अपनी सभी फिल्मों में आपकी फेवरिट कौन सी है?

(हंसते हुए) अभी आने वाली है। जब मैंने ‘आंखों देखी’ की थी तो लगा कि ये सबसे बेस्ट है। फिर मसान आई, फिर कड़वी हवा.. और फिलहाल ‘कामयाब’ ही बेस्ट लग रही है। अभी अनीस बज़्मी की ‘भूल भुलैया 2’ की शूटिंग शुरु हुई है, उसमें भी बड़ा दिलचस्प किरदार है।


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